आदिम रिश्तों का पर्व

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आस्था का पर्व छठ इन पंक्तियों के लिखे जाने तक संपन्न हो चुका है। बहत्तर घंटे से भी ज्यादा देर की अनवरत साधना की समयसीमा समाप्त हो चुकी है। अब अगले साल यह पर्व फिर आएगा और ताज्जुब नहीं होना चाहिए कि पहले से कई गुना ज्यादा वेग से इस महापर्व की लोग अगवानी करेंगे, उसकी पालकी (दौरा, सूप, गुड़ से पके पकवान, गन्ना) ढोएंगे, उसकी थाल सजाएंगे, नदियों, पोखरों और तालाबों में कमर तक घुस कर दोनों वक्त की सूयरेपासना करेंगे, सूरज से कहेंगे-यह सब कुछ तुम्हारा है..तेरा तुझको अर्पण। हर साल इसके गुण ग्राहकों की संख्या गुणात्मक ढंग से बढ़ती क्यों जा रही है? क्या वजह है कि लगभग पचासेक साल पहले जो पर्व बिहार और उसके सीमावर्ती पूर्वी उत्तर प्रदेश के ग्रामीण हलकों तक सीमित था, वह देश की हदें लांघ कर फिजी, सूरीनाम, मारीशस, यहां तक कि अमेरिका और ब्रिटेन जा पहुंचा है-हू-ब-हू उसी पैटर्न के साथ? कौन है इसका संवाहक? बहुत ठीक से समझ लेना होगा कि इसकी संवाहक लड़कियां हैं। वे जहां गई, इसे अपने साथ लेती गई। वही लड़कियां जिन्हें सनातनधर्मी, कर्मकांडी और वेदपाठी ताकतें लड़कों के मुकाबले हर हाल में कमतर आंकती हैं। एक तरफ यह पर्व कर्मकांड का घनघोर निषेध करता है तो दूसरी ओर यह पुरु ष वर्चस्व के तिलिस्म को भी तोड़ता है। यह हिन्दी जनपद का इकलौता पर्व है जहां सूर्य दोहरी भूमिका में होता है। वह ‘‘सूरुज देव’ भी होता है और ‘‘छठ मइया’ भी। विराट अर्थो में देखें तो यह लैंगिक समानता का पर्व है, जिसकी जड़ों का हिन्दी पट्टी के नारी समाज की अन्तश्चेतना तक पर कब्जा है। जब तक यह समाज रहेगा, जब तक इसकी रफ्तनी रहेगी, इस महापर्व की महत्ता लगातार बढ़ती रहेगी क्योंकि यहां कोई पंडित-पुरोहिताई का टोटका, कोई लटका-झटका है ही नहीं। यहां विशुद्ध रूप से प्रकृति है, उसके उपादान हैं, फल-फूल हैं, प्रकृति के साथ बने रहने की जिद है, सूरज से ताकत लेने की बेचैनी है और इस ग्रहण की हुई ताकत के जरिये जिंदगी की जद्दोजहद से जूझने की अपरंपार लालसा है। इससे भी बड़ी बात यह कि इस पूरी कवायद के नाभि केंद्र में वह औसत आदमी है जिसे रोज कोई-न-कोई महासमर लड़ना और हर बार बच निकलना होता है-सारे दन्द-फन्द की जाल काटते हुए। इसकी हदें मानव मात्र तक ही हों, ऐसा भी नहीं हैं। वे समस्त प्राणी जगत तक जाती हैं। उनके कल्याण की कामना करती हैं। चर-चराचर में जो भी है, वह सलामत रहे- ऐसी उदात्त कामना का त्योहार भला और कहां मिलेगा?

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