आज के सवालों को बेबाकी से रखता है नाटक ‘‘कबिरा खड़ा बाजार में’

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प्रेमचंद रंगशाला में भीष्म साहनी के नाटक ‘‘कबिरा खड़ा बाजार में’ का मंचन तनवीर अख्तर के निर्देशन में किये जाने के साथ ही इप्टा का दो दिवसीय आयोजन बुधवार को समाप्त हो गया। नाटक के माध्यम से निर्देशक तनवीर अख़्तर ने मॉब लिंचिंग की बढ़ती घटनाओं को मार्मिक ढंग से प्रस्तुत किया। साथ ही शासकों के द्वारा धर्म के नाम पर की जा रही राजनीति को भी अभिनय और निर्देशकीय जादू से तार-तार कर दिया। कबीर की बेबाकी और बेखौफ संघर्ष को प्रस्तुत करते हुए पटना इप्टा के कलाकारों ने आम आदमी की भावनाओं को सामने रखा। भीष्म साहनी द्वारा लिखित यह नाटक मध्यकालीन भारत में चरमोत्कर्ष पर पहुंचे बाह्य आडंबर और धर्मान्धता के परिदृश्य में सूफी-भक्ति आन्दोलन की मजबूत विरासत को प्रस्तुत करता है। इस आन्दोलन ने न सिर्फ बाह्याचार का जबरदस्त विरोध किया बल्कि मानव प्रेम पर जोर दिया। इसी दौर में कबीर ने जिस तरह बेखौफ मुल्लाओं- ब्राrाणों के पाखंड, धर्मान्धता, अनाचार, तानाशाही आदि के प्रति आक्रामक रुख अपनाया, वह आज भी अनुकरणीय है। कबीर ने समाज के दबे-कुचले, अधिकारविहीन समुदाय की आवाज बनने की कोशिश की। उसने अन्याय के विरुद्ध तीखे बोल बोले। कबीर के बेखौफ बोल धर्म के मठाधीशों को, शासक वर्ग को चुभते हैं, पर साधारण जन को इनमें अपना दिल बोलता दिखाई पड़ता है। इस नाटक के जरिये इप्टा कबीर के बेखौफ व्यक्तित्व और समझौता विहीन संघर्ष को दर्शकों के सामने खड़ा करने की कोशिश करता है। कलाकारों ने संवादों, गीतों और अभिनय, भाव-भंगिमा से मध्यकालीन भारत के संघर्ष को साकार करने की कोशिश की है। नाटक में अभिनय के स्तर पर यथार्थवादी अवधारणा के तहत ही अभिनेताओं ने अभिनय किया, बल्कि अनौपचारिक स्वरूप में। परवेज अख्तर के कॉस्ट्यूम डिजाइन में वातावरण निर्माण पर अधिक ध्यान दिया गया, जिससे मध्यकालीन भारत की सामाजिक पृष्ठभूमि का अहसास होता है। रंगों के इस्तेमाल से चारित्रिक विशेषताओं को उजागर किया गया है। कबीर की मंडली एवं साधारण लोगों के विपरीत सकिंदर लोदी, कायस्थ और कोतवाल, सैनिक आदि के लिए रंगों का व्याकरण अलग है जिसमें उनकी नृशंसता उभरती है। इप्टा के प्लैटिनम जुबली वर्ष में ‘‘कबिरा खड़ा बाजार में’ का प्रदर्शन उन मूल्यों की प्रतिबद्धता की अभिव्यक्ति है, जिनका प्रतिपादन कबीर के पूरे नजरिए से होता है और जिनके लिए इप्टा पिछले 75 सालों से संघर्ष करती रही है।नाटक के पात्रविनोद कुमार (कोतवाल), कुमार रविकांत (कायस्थ), महंत (रवि रौशन), धीरज कुमार, मनीष कुमार, बांके बिहारी (नागरिक), सूरज पांडे (कबीर), रोशन कुमार (साधु), सीमा कुमारी (बच्चा), रजनीश कुमार (जुलाहा करमदीन), सुनील किशोर (नूरा), नूतन तनवीर (नीमा), संजय कुमार (पीपा), विकास श्रीवास्तव (कबीरा), अभिमन्यु कुमार (सेना), रवि प्रकाश (रैदास), अंकित अशोक (मौलवी), टीपू सुल्तान (शेख), रजनीश कुमार (चोबदार), शशिकांत (अंधा भिखारी), प्रियंका कुमारी (अंधी मां), सुमित भारती (भक्त), विनय प्रताप (लड़का), मेहताब खान (नाई), सुष्मिता रानी (लोई), बांके बिहारी, रजनीश कुमार, सुमित भारती, विनय प्रताप (सैनिक), जावेद अख्तर खां (सिकन्दर लोदी) के अलावा रवि रौशन, शशिकांत, धीरज, स्नेहा ठाकुर, सीमा कुमारी, हयात खान आदि ।

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