अब आठ फरवरी को अयोध्या मामले की सुनवाई

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राम जन्म भूमि-बाबरी मस्जिद स्थल के मालिकाना हक को लेकर उच्चतम न्यायालय में मंगलवार को शुरू हुई सुनवाई में गरमा-गरम बहस हुई। मस्जिद पक्ष ने कहा चूंकि मंदिर मुद्दा भाजपा के चुनाव घोषणा पत्र का हिस्सा था इसलिए इसकी सुनवाई 2019 के लोकसभा चुनाव के बाद हो लेकिन अदालत ने इस अपील को ठुकराते हुए सुनवाई तारीख आठ फरवरी तय कर दी। अदालत ने मस्जिद पक्ष की इस अपील को भी ठुकरा दिया कि मामले की सुनवाई सात सदस्यीय पीठ के समक्ष की जाए। मस्जिद पक्ष की अपीलें ठुकराई : सुप्रीम कोर्ट में मंगलवार को अयोध्या मामले की सुनवाई जैसे ही शुरू हुई सुन्नी वक्फ बोर्ड के वकील कपिल सिब्बल ने सुनवाई पर सवाल उठाते हुए कहा कि इस मामले की सुनवाई सात न्यायाधीशों वाली संवैधानिक पीठ द्वारा की जानी चाहिए। इस पर प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्रा, न्यायमूर्ति अशोक भूषण और न्यायमूर्ति एस अब्दुल नजीर की तीन सदस्यीय विशेष पीठ ने पहली नजर में कपिल सिब्बल और राजीव धवन सहित अनेक वरिष्ठ अधिवक्ताओं का यह अनुरोध अस्वीकार कर दिया। बहिष्कार की धमकी : सुनवाई के दौरान उस समय कुछ गरमी आ गई जब पीठ ने राम लला विराजमान पक्ष का प्रतिनिधित्व कर रहे वरिष्ठ अधिवक्ता सीएस वैद्यनाथन से कहा कि वह बहस शुरू करें इसपर सुन्नी वक्फ बोर्ड और बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी के वकीलों ने अदालती कार्यवाही के बहिष्कार की धमकी दे डाली। वरिष्ठ अधिवक्ता दुष्यंत दवे ने इन अपीलों पर सुनवाई की ‘‘जल्दी’ पर सवाल उठाए और कहा कि यह भी तय है कि राम मंदिर का मुद्दा भाजपा के चुनाव घोषणा पत्र का हिस्सा था। इस पर पीठ ने तल्खी से कहा, आप कह रहे हैं कि इसकी सुनवाई कभी नहीं की जानी चाहिए क्योंकि पिछले सात साल में इसकी सुनवाई नहीं हुई।मस्जिद पक्ष ने समय मांगा : सिब्बल ने कहा कि इन मामलों के दस्तावेजी विलेख पूरे नहीं हो सके क्योंकि ये 19 हजार से अधिक पन्नों का रिकार्ड है। दूसरे दस्तावेज मिलने शेष हैं जो इन डिस्क में नहीं हैं और जिनका अभी भी इंतजार है।यूपी सरकार का पक्ष : उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से अतिरिक्त सालिसीटर जनरल तुषार मेहता और राम लला विराजमान की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता सी एस वैद्यनाथन ने इस दलील का विरोध किया और कहा कि लिखित प्रक्रि या पूरी हो चुकी है और आवश्यक दस्तावेज दाखिल करने के बाद दिए जा चुके हैं।टिप्पणी पर ऐतराज : साल्वे और तुषार मेहता ने इन अपीलों पर शीर्ष अदालत में सुनवाई की ‘‘जल्दी’ जैसी मस्जिद पक्ष के वकीलों की टिप्पणी पर कड़ी आपत्ति की। तुषार मेहता ने कहा, मैं इस पर कड़ी आपत्ति करता हूं कि शीर्ष अदालत जल्दी में है। सात साल बीत गए हैं और पीठ ने नहीं कहा कि उसे जल्दी है। धवन ने तो यहां तक कह दिया कि इन अपीलों की सुनवाई अगले साल अक्टूबर तक (जब प्रधान न्यायाधीश सेवानिवृत्त होंगे) पूरी नहीं होगी। पीठ ने जैसे ही दुबारा कहा, यह किस तरह का तर्क है। तो वह तुरंत इससे पीछे हट गए।अदालत की दलील : पीठ ने सवाल किया, जब इलाहाबाद उच्च न्यायालय मूल वाद की सुनवाई 90 दिन में पूरी कर सकता है तो इसमें यहां ज्यादा लंबा समय क्यों लगना चाहिए। पीठ ने साथ ही यह भी कहा, दोनों पक्षों के पास इस न्यायालय के लिए संदेश था। परंतु हम जानते हैं कि क्या करना है। इस न्यायालय को यह कहकर हमें संदेश मत दीजिये कि हम बाहर क्या संदेश भेजेंगे। साल्वे ने कहा कि वह इस तरह की दलीलें सुनकर आहत हैं जबकि हकीकत तो यह है कि ये अपीलें 2010 से ही लंबित हैं।इस न्यायालय ने इससे पहले भी कई संवेदनशील मामलों को निबटाया है और बाहर पडने वाले इसके प्रभाव यह फैसला नहीं करेंगे कि मामले की सुनवाई कब होगी। उन्होंने कहा कि इस मामले की सुनवाई संविधान को करनी है या नहीं, यह तो पीठ बाद में तय कर सकती है यदि भविष्य में ऐसे सवाल उठते हैं।

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