अतिपिछड़ों को गोलबंद करने में जुटीं राजनीतिक पार्टियां

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बिहार में अगला विधानसभा चुनाव होने में एक वर्ष से अधिक समय बाकी है पर जो राजनीतिक दलों में सदस्यता अभियान को लेकर जो माहौल खड़ा हुआ है उसे देखकर कहा जा सकता है कि बिहार विधानसभा चुनाव की उलटी गिनती अभी से शुरू हो गई है। राष्ट्रवाद व आतंकवाद से इतर बिहार विधानसभा चुनाव में इस बार अतिपिछड़ा कार्ड चलने का आसार है। केन्द्रीय मंत्री रामविलास पासवान की अगुवाई वाली पार्टी लोजपा से अलग होकर बनी लोजपा सेक्युलर ने सरकार बनने पर अगला मुख्यमंत्री अतिपिछड़ा समाज से बनाने का एलान कर दिया है।भाजपा ने सोशल इंजीनियरिंग के तहत प्रदेश के अतिपिछड़ा समाज को गोलबंद करना शुरू कर दिया है। इस सिलसिले में 27 अगस्त को राजधानी के बापू सभागार में बिंद, वेलदार व नोनिया समाज के नेता इकट्टा हो रहे हैं। हालांकि सम्मेलन का मुख्य मकसद राज्यपाल फागू चौहान को सम्मानित करना है। भाजपा का सहयोगी जदयू का फोकस भी अतिपिछड़ों पर है। लेकिन एनडीए के लिए राजनीतिक झटका है कि रामविलास पासवान की अगुवाई वाली लोक जनशक्ति पार्टी में बिखराव होकर लोक जनशक्ति पार्टी सेक्युलर नाम से एक अलग पार्टी बिहार की राजनीति में खड़ा हो गई है। लोजपा सेक्युलर ने अतिपिछड़ा समाज से मुख्यमंत्री बनाने का एजेंडा तैयार कर लिया है। लोजपा सेक्युलर के संस्थापक डॉ. सत्यनांद शर्मा ने अगला मुख्यमंत्री अतिपिछड़ा समाज से बनाने की मांग की है। उनका कहना है कि प्रदेश में 36 फीसदी संख्या अतिपिछड़ों की है तो आखिर इस समाज से मुख्यमंत्री क्यों नहीं बनाया जा रहा है। लोजपा सेक्युलर आगामी विधानसभा उपचुनाव व लोकसभा उपचुनाव में पहली बार मैदान में उतरने की भी योजना तैयार कर रही है। देश में अतिपिछड़ी जातियों की संख्या सर्वाधिक है। बिहार में करीब 36 फीसदी अतिपिछड़ी जातियों की जनसंख्या है। संख्याबल भले ही अतिपिछड़ी जातियों का अधिक हो पर राजनीति में पिछड़ी जातियों (ओबीसी) के नेताओं का ही दबदबा है। पिछड़ी जातियों में भी एक-दो खास पिछड़ा वर्ग ही लीडर की भूमिका में रहे हैं। यह बात अब धीरे-धीरे बिहार की राजनीति में फैलने लगी है। लिहाजा अब राजनीतिक दल अतिपिछड़ी राजनीति को केन्द्र में रखकर रणनीति बना रही हैं। पिछले लोकसभा चुनाव में जब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का नाम अतिपिछड़े नेता के रूप होने लगी तो बिहार में भी खासकर विरोधी खेमे में खलबली मच गई। विरोधियों ने नरेन्द्र मोदी की जाति को लेकर तरह-तरह के बयान देने शुरू कर दिए थे। स्पष्ट है पिछले लोकसभा चुनाव में भी राष्ट्रवाद के साथ अतिपिछड़ी राजनीति भी खूब चली थी। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पिछड़ी जाति से हैं। गुजरात के धांची ही बिहार, झारखंड, ओडिशा, छत्तीसगढ़ सहित देश के आधे दर्जन राज्यों में ‘‘तेली’ के नाम से जाने जाते हैं। अगले विधानसभा चुनाव में लोकसभा चुनाव से इतर नया समीकरण भी बन सकता है। महागठबंधन के अस्तित्व पर कयास चल रहा है। महागठबंधन के घटक हिन्दुस्तानी आवाम मोर्चा सेक्युलर ने प्रदेश के सभी 243 सीटों पर चुनाव लड़ने का एलान कर दिया है। कांग्रेस के सुर भी बदले हुए हैं। इस बार भाजपा की अगुवाई वाले एनडीए ने आंकड़े के अंकणित में महागठबंधन को पटखनी दी है। भाजपा-जदयू-लोजपा के गठजोड़ ने 53.22 फीसदी मत लाकर महागठबंधन को पटखनी दी है। महागठबंधन को करीब 31 फीसदी ही मद प्राप्त हुआ है। इस तरह एनडीए को करीब 22 फीसदी सेअधिक मत प्राप्त हुआ है, जो रिकॉर्ड है। भाजपा को 23.62 फीसदी मत प्राप्त हुआ है। जदयू को 21.7 फीसदी मत प्राप्त हुआ है जबकि लोजपा को 7.9 फीसदी मत प्राप्त हुआ। महागठबंधन में राजद को 15.4 फीसदी, कांग्रेस को 7.7 फीसदी, हम को 4 फीसदी व अन्य को 4 फीसदी मत प्राप्त हुआ है। यही कारण है कि बिहार में एनडीए को 39 सीटें मिली है। भाजपा की मजबूत गठजोड़ नीति के आगे महागठबंधन की एक भी नहीं चली।

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