अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस : बिहार में महिला सशक्तीकरण

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Patna-Mar.7,2019-Girls are performing their art of dance during mass rally against women’s violence at Gandhi Maidan in Patna on the eve of International Women’s Day, under banner of Umarte Sau Crore Abhiyan, Bihar. Photo by – Sonu Kishan.

दृढ़ इच्छाशक्ति के जरिये कोई भी लक्ष्य पाया जा सकता है। यह सेंचुरी महिलाओं के बदलाव का साक्षी बन रहा है। यूं समाज के पायदान पर वैसी महिलाएं भी पूरे यत्न से खड़ी नजर आ रही हैं, जो अभावों से ग्रस्त हैं लेकिन अपने फैसले खुद ले रही हैं। महिला दिवस के मौके पर ऐसी महिलाओं का संदेश साफ है कि कोई भी लक्ष्य मनुष्य से बड़ा नहीं, हारा वही जो लड़ा नहीं।

बिहार में मौजूदा सरकार के कार्यकाल में महिलाओं को आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक रूप से सशक्त बनाने के लिए कई महत्वपूर्ण ठोस कदम उठाये गये हैं। महिला सशक्तीकरण को लेकर त्रिस्तरीय पंचायत और स्थानीय निकायों में 50 फीसद स्थान आरक्षित किया गया है। सहकारी संस्थाओं की प्रबंध कार्यकारिणी में महिलाओं के लिए आधी सीटें व राज्य की सरकारी नौकरियों में 35 फीसद आरक्षण की व्यवस्था की गयी है। शिक्षक नियुक्ति में भी महिलाओं को प्राथमिकता दी गयी है। बच्चियों के लिए साइकिल, पोशाक के साथ-साथ कन्या उत्थान योजना भी शुरू की गयी है। 60 वर्ष से कम उम्र की विधवाओं के लिए सामाजिक सुरक्षा पेंशन योजना भी लागू की गयी है। महिला साक्षरता में वृद्धि हुई है। हालांकि इन योजनाओं के बावजूद लिंगानुपात में गिरावट चिंता का विषय बना हुआ है।2001 की जनगणना में सूबे में एक हजार पुरु षों पर महिलाओं की संख्या 919 थी। 2011 की जनगणना में लिंगानुपात 919 से घटकर 916 पर आ गया। इसके विपरीत पूरे लिंगानुपात का राष्ट्रीय औसत 2001 में 933 था, जो 2011 में बढ़कर 940 हो गया। हालांकि साक्षरता दर में 17.9 फीसद की तेज वृद्धि दिखी है। बिहार में महिला सक्षरता 2001 के 33.6 फीसद की तुलना में 2011 में बढ़कर 51.5 फीसद हो गयी है।

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भूख ने जिंदगी की जो कड़वाहट दी उस कड़वाहट को मिठास में बदल दिया नेहा ने अपनी मेहनत से। पति की प्रताड़ना से तंग नेहा ने नन्हे बच्चे का हाथ थाम घर की देहरी से बाहर कदम रखा। मेहनत रंग लाई और नव अस्तित्व फाउंडेशन द्वारा चलाई जा रही साई की रसोई की साई बन बैठीं नेहा। यानी नेहा संस्था द्वारा चलायी जा रही रसोई में रोजाना लगभग दो सौ रोटियां अकेले पकाती हैं। भूखों के समक्ष उनकी बनाई रोटियां परोसी जाती हैं। भूख की तपन महसूस कर चुकी नेहा को समाज सेवा के काम से जो सुकून मिल रहा है, अब वे पिछली जिंदगी की सारी कड़वाहट भूल चुकी हैं। नेहा (रसोइया)

आवाज बुलंद की और कहा हमें भी है जीने का अधिकार। जन्म लेने के बाद अपनों का प्यार नसीब नहीं। बना दी गई बेगाना क्योंकि वे किन्नर थीं। वीरा ने जब घर से बाहर जाने की इच्छा जताई तो घर वालों ने उसके बाल काट दिये। कैंची से मार कर सर फोड़ दिया। घरवालों की जिद थी कि समाज यह न जाने कि उनके घर का एक सदस्य किन्नर है। विद्रोह की ताकत मजबूत हुई और एक दिन वीरा घर से बाहर निकल गई और अपने दम पर कॉलेज की शिक्षा पूरी करने के बाद पटना विवि से पीजी की डिग्री हासिल की। अब पीएचडी करने की तैयारी में है वीरा। समाज सेवा के जरिये वह अपनी पहचान बनाने में भी कामयाब हुई। वीरा यादव ( ट्रांसजेंडर समाज सेविका) :

समाज और जाति की बात अनसुनी कर रूबी देवी ने अपना मुकाम बनाया। घर की आर्थिक स्थिति को मजबूत नींव देने के लिए वह देहरी से बाहर निकल एक सहयोगी एनजीओ में काम करने लगी। दो बच्चों को अच्छी शिक्षा देने की ख्वाहिश रंग लाने लगी है। रूबी चाहती हैं कि दलित समुदाय की महिलाएं घरों से बाहर निकलें और अपनी पहचान बनाएं । रूबी देवी

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स्वतंत्र पहचान बनाने की इच्छा इतनी बलवती हुई कि गुड़िया ने पटना की सड़कों पर ऑटो चलाने के शौक को बखूबी परवान चढ़ाया। हालांकि ऑटो चलाने की ट्रेनिंग जब शुरू हुई तो गुड़िया को महसूस हुआ कि यह काम उससे नहीं होगा। खास कर जाम में हाथ-पांव कांपने लगते। लेकिन हौसले ने साथ न छोड़ा और आज वह छह साल से ऑटो चला रही हैं। गुड़िया चाहती हैं कि पटना की सड़कों पर ज्यादा से ज्यादा महिला ऑटो चालक दिखें। गुड़िया (ऑटो चालक)

बिहार में महिला सशक्तीकरण की अगदूत थीं रूकैया सखावत हुसैन

रूकैया सखावत हुसैन, यह वह नाम है, जिसने बिहार में पहली बार लड़कियों को शिक्षित करने के लिए न सिर्फ आवाज उठायी, बल्कि कुछ कर भी दिखाया. उन्होंने भागलपुर में लड़कियों के लिए पहला स्कूल खोला.

यह तब की बात है, जब लड़कियों को शिक्षित करना किसी अजूबे से कम नहीं था. समाज के लिए यह अकल्पनीय काम था. यही कारण है कि इस स्कूल का खूब विरोध भी हुआ. रूकैया का जन्म वर्तमान बांग्लादेश के रंगपुर में हुआ था. परिवार जमींदार और शिक्षित था.

इसका असर इन पर हुआ. रूकैया ने बांग्ला, उर्दू और अंग्रेजी की शिक्षा हासिल की और लेखन करने लगीं. महिलाओं के अधिकार और उनकी समस्याओं पर खूब लिखा. उनकी शादी 1896 में अंग्रेजी सरकार में बड़े अधिकारी और भागलपुर के रहने वाले सखावत हुसैन से हुई.

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सखावत खुद उच्च शिक्षित थे. वह रूकैया के सपनों को साकार करने के लिए हर संभव मदद करने लगे. उनकी अंग्रेजी में लिखी रचना ‘सुल्ताना का सपना’ 1905 में आयी. यही वह रचना थी, जिसके कारण उनकी पहचान जिंदा रही. 1909 तक भागलपुर में रहने के बाद वह कोलकाता चली गयीं. इस वक्त उनके पति का देहांत हो चुका था. इसके बाद की पूरी जिंदगी रूकैया ने साहित्य से दूरी बना ली और लड़कियों को शिक्षित करना अपनी जिंदगी का लक्ष्य बना लिया. कोलकाता में उनका खोला हुआ स्कूल आज भी मौजूद है.

कोलकाता जाने के बाद भी बिहार से उनका लगाव बना रहा. इसे साबित करती है उनकी चर्चित रचना ‘अबरोध बासिनी’, जिसमें उन्होंने आरा, किऊल जैसी जगहों का कई बार जिक्र किया है. उन पर शोध कर रहे वरिष्ठ पत्रकार नसिरूद्दीन कहते हैं कि रूकैया ने बिहार में लड़कियों का पहला स्कूल खोला था. उनके पति ने अपनी मृत्यु से पहले लड़कियों के स्कूल के लिए 10 हजार रुपये अलग से रखे हुए थे.

यह रकम उस जमाने में बड़ी रकम थी. बिहार के लिए उन्होंने बहुत कुछ किया, लेकिन दुख की बात है कि बिहार ने उन्हें वह सम्मान नहीं दिया, जिसकी वह हकदार हैं. वह कहते हैं कि बंटवारे के कारण शायद उनका इतिहास कहीं खो सा गया. अगर वह अंग्रेजी में अपनी रचना नहीं करतीं तो शायद आज हम उन्हें जितना जानते हैं, उतना भी नहीं जानते.

 

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